२१ दिनों की क्रांति

डॉक्टर विकास पाण्डेय




२१ दिनों तक देश को लॉक डाउन करने की घोषणा, देश और नागरिकों के लिए बहुत सारी उत्तम सम्भावनाओं को जन्म देती है | लॉक डाउन होने की संभावना, प्रधानमंत्री के १९ मार्च को दिए गए संबोधन में ही परिलक्षित हो रही थी, जब उन्होंने जनता कर्फ्यू का आग्रह किया | सरकार के अनुरोध पर देश के हर वर्ग ने २२ मार्च को जनता कर्फ्यू का सम्पूर्ण पालन किया | देश के प्रधानमंत्री ने एक नवीन प्रयोग किया और देश वासियों ने इस प्रयोग में उनका भरपूर साथ दिया | यह देखना मेरी सोच से परे था कि कैसे शहर थम गए, सड़कें सूनी हो गई, बाजार खाली हो गए, धार्मिक स्थलों के अंदर ईश्वर ने भी खुद को अनुशासित किया और भक्तों को घर रहने को विवश किया | भारत जैसे लोकतंत्र में जहाँ राजनीतिक दलों में हज़ार मतभेद है, अनगिनत विविधतायें है| वहाँ देश में आई एक आपदा के खिलाफ इस तरह सबका एक साथ आना अभूतपूर्व था | नागरिकों के अनुशासन ने सरकार को अग्रिम चरण के लिए एक विश्वास दिया और सरकार ने पूरे भारत में २१ दिनों का लॉक डाउन घोषित किया | कोरोना की लड़ाई में, ये बचे हुए एक एक दिन बहुत ही संवेदनशील है, जहाँ हम कोरोना के चक्र को तोड़ सकते हैं और इस महामारी से खुद को और अपने परिवार को बचा सकते है | हर नागरिक को एक क्रांतिकारी की तरह इस युद्ध को लड़ना हैं, और इस संग्राम में ख़ुद के साथ देश को भी विजयी बनाना हैं |

ये २१ दिन कोरोना रूपी विदेशी आक्रांता के विरुद्ध क्रान्तिकाल है| इस क्रांति में हमें अपनी जान नहीं देनी , खून नहीं बहाना , केवल और केवल अपने घर पर रहना हैं| ये क्रांति हमें आत्म दर्शन का अवसर देती है| दुनिया बहुत ही तीव्र गति से बढ़ रही थी, हर किसी के मुख से ये सुनना सामान्य था कि "व्यस्त है”, “समय नहीं है"| ये २१ दिन आपके जीवन को एक ठहराव दे रहे है, ये समय है जब हमें नयी आदतों को सीखना है , जब हम अपने परिवार के साथ अच्छा वक़्त गुजार सकते है | हमें घर बैठ के जीवन के लक्ष्यों का आकलन करना है | यह समय हर उस व्यक्ति को फ़ोन करके का है, जो जीवन के तेज़ रफ़्तार के बीच कहीं पीछे छूट गया है | वीडियो कॉल के इस दौर में किसी से बात करना कोई दूर की कौड़ी नहीं है, किसी से प्रत्यक्ष मिलना नहीं है | बातचीत के साथ ये भी दोहराना जरुरी है कि वो भी घर पर रहें और देश को कोरोना महामारी से बचाएं |

देश के नागरिकों का व्यवहार, देश के व्यवहार को परिभाषित करता है | हमारा देश विश्व के अन्य देशों से अधिक अनुशासित हैं , लेकिन हमें और अधिक अनुशासित होने की जरुरत हैं| हमारे देश में नागरिकों के बीच आपसी सामंजस्य अधिक हैं, एक दूसरे के भले की सोच है| २१ दिनों का हमारा अनुशासन देश को आगे आने वाली विपदाओं के लिए तैयार करेगा | जिस तरह विश्व के देशों में मनुष्यों द्वारा अन्य प्राणियों पर अत्याचार हो रहे है, उनको बिना उबालें खाया जा रहा , इसी तरह के अन्य कई वायरस आने वाले समय में आयेंगे | इस तरह के विषाणु का एक चरित्र है कि ये अपने रूप को बदलता है और अधिक क्षमता के साथ मानव जाति पर आक्रमण करता है | आज के अनुशासन की आदत भविष्य की आपदाओं के लिए हमारा प्रशिक्षण है | भले ही हमारे देश में माँसाहार की परंपरा बहुत अधिक नहीं हैं, जंगली जानवरों की खाने की प्रवृत्ति तो नहीं के बराबर है , लेकिन विश्व के अन्य देशों को हम जंगली प्राणियों के सेवन से नहीं रोक सकते| फिर भी हमें उनकी गलती की सजा भुगतनी पड़ेगी | इसलिए देश के व्यवहार की, देश के अनुशासन की परीक्षा अति आवश्यक थी, कोरोना महामारी को हमें एक अवसर की तरह देखना चाहिए |

आपातकाल में अफवाहों का जोर होता है ,अफवाह नागरिकों में भय का वातावरण पैदा करता है | सोशल मीडिया के दौर में अफवाह आग की तरह फैलती है | नागरिकों की खुद का विश्लेषण होता है , लेकिन हम भूल जाते हैं , सरकार को भी चिंता होती है , उनके पास सैकङों विशेषज्ञों का समूह होता है , जो बिना थके काम करते है और समयानुसार उचित सलाह उपलब्ध करते हैं | इस तरह कम से कम आपातकाल में हमें केवल सरकार के निर्देशों का अक्षरशः पालन करना चाहिए | अफवाहों से बचने की कला हमें इन २१ दिनों में सीखनी हैं |

मीडिया ने अभूतपूर्व रूप से, इस महामारी के प्रभाव से, देशवासियों को तथ्यात्मक रूप से अभी तक अवगत कराया हैं , देश में डर का माहौल नहीं पैदा होने दिया | चीन जैसे देशों में, मीडिया सरकार के निर्देश से चलती हैं, जिससे इस महामारी की प्रारंभिक जानकारी से छेड़छाड़ की गई , जिसका भुगतान अब पूरा विश्व कर रहा है| वहीँ भारतीय मीडिया स्वतंत्र है, बिना भय पैदा किये मीडिया ने अब तक इस महामारी से लड़ने में सरकार और साथ ही नागरिकों के साथ कंधे से कन्धा मिल कर लड़ाई लड़ी है| आने वाले दिनों में मीडिया की भूमिका अधिक बढ़ जाती है| मीडिया को लगातार देश वासियों को बताते रहना है " कोई रोड पर न निकलें "|

सरकार सब कुछ नहीं कर सकती , नागरिक बहुत कुछ कर सकता है | अगर आने वाले दिनों में हम सरकार के निर्देशों का पालन नहीं करते , अनुशासित नहीं रहते तो, जैसा हमारे प्रधानमंत्री ने कहा “देश २१ साल पीछे चला जायेगा” | देश केवल पीछे ही नहीं जायेगा बल्कि हम अपने लोगों को इस बीमारी के कारण खो भी सकते है | क्या हम ये नुकसान उठाने को तैयार हैं ? प्रशासन, स्वास्थय , सुरक्षा , बैंक , या अन्य महत्वपूर्ण विभाग के कर्मचारी बधाई के पात्र है | ये सारे योद्धा पूरे मनोयोग से बिना जान के परवाह किये, देश की सेवा में लगे है | हालाँकि समस्याएँ बहुत है , उन समस्यायों के निराकरण के लिए नए-नए प्रयोग भी देखने को मिल रहे है| राष्ट्रीय प्रशासन से ग्रामीण प्रशासन तक सूचना का दैनिक प्रवाह और आदेशों का पालन, १३० करोड़ के हमारे विशाल देश में एक सुखद अनुभूति देता है | कहीं कहीं पर दैनिक मजदूरों की समस्याएं सामने आ रही है , इतने बड़े देश में ऐसी छोटी समस्याएं अपरिहार्य है | हालाँकि कहीं-कहीं जब इन मजदूरों को अमानवीय तरीके से दंड दिया जाता है, तब थोड़ा दुःख होता है| मानवीय तरीकों से अनुशासन भंग करने वालों को समझाने की कला प्रशासन को सीखने की आवश्यकता है | जिस देश में आधी से अधिक आबादी दिहाड़ी मजदूरी करके खाती हो , उन्हें अनुशासित भी करना है और हमें खुद भी सीखना है कि हमारे आस पास कोई भूखा न सोए | भूखे पेट के लिए एक दिन ही बहुत भारी होते है | सरकार हर व्यक्ति तक पहुँच कर उनकी आवश्यक जरूरतों का प्रबंध जरूर करेगी, लेकिन ये अपरिहार्य है कि सरकार की नज़रों से कई छूट भी सकते हैं | घर पर रहते हुए, लॉक डाउन के बचे हुए दिनों में, हम ये ध्यान रख सकें कि घर आस पास कोई भूखा ना सोये| २१ दिनों में यहीं दो सीख़ ही, इस क्रांति को सफल बना देगी , और २१ दिन बाद देश और देशवासी सीना तान के दोबारा प्रगति पथ पर बढ़ चलेगा|


डॉक्टर विकास पाण्डेय

लेखक यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया में पोस्ट डॉक्टोरल फेलो है


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